लखनऊ (ब्यूरो): राजधानी लखनऊ में सार्वजनिक परिवहन से जुड़ी एक बड़ी समस्या सामने आ रही है। संविदा पर कार्यरत ड्राइवरों और कंडक्टरों की व्यवस्था को निजी ऑपरेटरों के हवाले करने के प्रस्ताव का विरोध लगातार जारी है। इसी बीच शहर की 40 से ज्यादा सिटी बसें सड़कों पर नहीं उतर पा रही हैं, जिससे आम लोगों को रोजमर्रा के सफर में काफी दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा है। सबसे ज्यादा असर उन लोगों पर पड़ रहा है जो हर दिन बसों के जरिए अपने स्कूल, कॉलेज, ऑफिस या अन्य जरूरी कामों के लिए यात्रा करते हैं।
लखनऊ में सिटी बस सेवा हजारों लोगों के लिए एक महत्वपूर्ण परिवहन साधन मानी जाती है। शहर के अलग-अलग इलाकों को जोड़ने वाली ये बसें कम खर्च में सफर का विकल्प देती हैं। लेकिन पिछले कुछ दिनों से कई रूटों पर बसों की संख्या कम होने से यात्रियों की परेशानी लगातार बढ़ रही है। सुबह और शाम के समय बस स्टॉप पर यात्रियों की भीड़ पहले से ज्यादा देखने को मिल रही है। कई लोगों को लंबे समय तक बस का इंतजार करना पड़ रहा है, जबकि कुछ यात्रियों को मजबूरी में ऑटो, ई-रिक्शा या कैब जैसी महंगी सेवाओं का सहारा लेना पड़ रहा है।
जानकारी के मुताबिक संविदा ड्राइवरों और कंडक्टरों की व्यवस्था को निजी हाथों में सौंपे जाने के प्रस्ताव को लेकर संबंधित कर्मचारियों में नाराजगी बनी हुई है। कर्मचारियों का कहना है कि इस तरह के बदलाव से उनके रोजगार और भविष्य को लेकर अनिश्चितता पैदा हो सकती है। इसी विरोध के बीच बस संचालन पर असर पड़ा है और बड़ी संख्या में बसें डिपो में खड़ी रहने को मजबूर हैं। हालांकि इस मामले में संबंधित विभाग और कर्मचारी संगठनों के बीच बातचीत की संभावनाएं भी जताई जा रही हैं।
इस स्थिति का सबसे ज्यादा असर छात्रों पर दिखाई दे रहा है। शहर के विभिन्न स्कूलों, कॉलेजों और कोचिंग संस्थानों में जाने वाले छात्र रोजाना सिटी बसों का उपयोग करते हैं। बसों की संख्या कम होने से उन्हें समय पर अपने गंतव्य तक पहुंचने में मुश्किल हो रही है। कई छात्रों का कहना है कि उन्हें पहले से ज्यादा समय लेकर घर से निकलना पड़ रहा है ताकि वे क्लास या परीक्षा के लिए देर न करें। वहीं कुछ छात्रों को बीच रास्ते में कई बार वाहन बदलकर यात्रा करनी पड़ रही है, जिससे समय और पैसा दोनों ज्यादा खर्च हो रहे हैं।
नौकरीपेशा लोगों की परेशानियां भी कम नहीं हैं। सुबह के व्यस्त समय में बसों की कमी के कारण कई लोग समय पर ऑफिस नहीं पहुंच पा रहे हैं। निजी वाहनों का उपयोग करने वालों पर भी इसका असर पड़ा है क्योंकि सार्वजनिक परिवहन कमजोर होने पर सड़कों पर अन्य वाहनों की संख्या बढ़ जाती है, जिससे ट्रैफिक का दबाव भी बढ़ने लगता है। कई कर्मचारियों का कहना है कि नियमित बस सेवा उनके दैनिक जीवन का महत्वपूर्ण हिस्सा है और सेवा बाधित होने से उनकी दिनचर्या प्रभावित हो रही है।
बुजुर्ग यात्रियों के लिए भी ये स्थिति चुनौतीपूर्ण बन गई है। सिटी बसें उनके लिए किफायती और सुविधाजनक यात्रा का माध्यम होती हैं। अस्पताल, बैंक, सरकारी कार्यालय या अन्य जरूरी कार्यों के लिए आने-जाने वाले वरिष्ठ नागरिकों को अब ज्यादा इंतजार करना पड़ रहा है। कुछ लोगों ने बताया कि बसें कम होने के कारण जो बसें चल रही हैं उनमें भीड़ बढ़ गई है, जिससे बुजुर्गों को सफर करने में अतिरिक्त कठिनाई महसूस हो रही है।
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शहर के कई प्रमुख रूटों पर बसों की कमी का असर साफ दिखाई दे रहा है। बस स्टॉप पर खड़े यात्रियों को अक्सर अगली बस के आने का लंबा इंतजार करना पड़ रहा है। कई स्थानों पर यात्रियों की संख्या बसों की उपलब्धता से कहीं ज्यादा नजर आ रही है। ऐसे में लोगों की मांग है कि संबंधित विभाग जल्द से जल्द इस समस्या का समाधान निकाले ताकि आम जनता को राहत मिल सके।
परिवहन विशेषज्ञों का मानना है कि किसी भी बड़े शहर में सार्वजनिक परिवहन व्यवस्था मजबूत होना बेहद जरूरी है। अगर बस सेवाएं प्रभावित होती हैं तो इसका सीधा असर लाखों लोगों के दैनिक जीवन पर पड़ता है। लखनऊ जैसे तेजी से विकसित हो रहे शहर में सिटी बस नेटवर्क की भूमिका और भी महत्वपूर्ण हो जाती है। ऐसे में प्रशासन और संबंधित पक्षों के बीच संवाद के जरिए समाधान निकालना जरूरी माना जा रहा है।
फिलहाल शहरवासी उम्मीद कर रहे हैं कि संविदा कर्मचारियों और विभाग के बीच चल रहे विवाद का जल्द समाधान निकलेगा और बंद पड़ी बसें दोबारा सड़कों पर लौटेंगी। जब तक स्थिति सामान्य नहीं होती, तब तक छात्रों, नौकरीपेशा लोगों और बुजुर्ग यात्रियों को अतिरिक्त परेशानियों का सामना करना पड़ सकता है। आने वाले दिनों में इस मुद्दे पर होने वाले निर्णय पर हजारों यात्रियों की नजरें टिकी हुई हैं, क्योंकि उनकी रोजमर्रा की यात्रा काफी हद तक सिटी बस सेवा पर निर्भर करती है।